रविवार, 5 दिसंबर 2010

हैरत की बात है

सबसे पहले उठने वाली
देर रात को सोने वाली
सब कष्टों को सहने वाली
हरदम खुश वो रहने वाली
पर हैरत की बात है ...

मंदिरों में पूजी जाने वाली
वहीं देवदासी बना दी जाती है
पुरुष प्रधान इस समाज में
वो इक वस्तु बनकर रह जाती है

नयी दिशा वो दिखलाती है
त्याग कई नित करती जाती है
पर नहीं पिता के जायदाद में
उसे एक पाई भी दी जाती है

कहने को घर की गृहस्वामिनी
पर नहीं किसी बात की आज़ादी
कागज़ की लक्ष्मी की पूँछ बड़ी
घर की लक्ष्मी अपमानित होती रही

जीवन का निर्माण करने वाली
कई बार स्वयं जनम नहीं पाती हैं
इक हज़ार के मुकाबले,वो बस
नौ सौ सत्ताईस पर सिमट जाती है

अत्याचार कई वो नित सहती
दोषी भी वही ठहराई जाती है
अपराजिता कही जाने वाली
हर आँगन में नित पराजित होती है

दहेज़ के बड़े बाजार में
लेन देन की बातें खूब चलती हैं
सुशिक्षित सभ्य संसार में
बेटियाँ और भी लाचार बनती हैं
इतनी सताई जाती की वो
मजबूरन जलकर मरती हैं

संतान न होने पर
ये दुनिया उसे बाँझ कहती है
हैरां हूँ मैं इस बात से की
किसी मर्द पर नहीं कभी
इसके लिए ऊँगली उठती है

नशे में धुत पति,घर में
पत्नी को ही क्यों मारता है
क्यों उसे सब याद रहता है
सिर्फ यही भूल जाता है

मैं आज तक नही समझ पाया
पति का कोई धर्म न निभाने वाले को भी
वो भगवान् क्यों समझती है,और
करवाचौथ का व्रत नारी ही क्यों रखती है

तितली सी वो उड़ने वाली
चिड़ियों सी वो चहकने वाली
फूलों सी वो महकने वाली
मुरझाई क्यों लगती है

प्रकृति के नियम को मनुष्य
इस तरह क्यूँ भूल बैठा है
बड़े हैरत की बात है,क्या
एक हाथ से कोई ताली बजा सकता है…

सोमवार, 18 अक्तूबर 2010

गाँव की सैर

बाबूजी,आओ ले चलूँ तुम्हे अपने गाँव अपने घर
शहर से,विकास से,आराम से कोसों दूर
घर है छोटा पर हमारे दिल बड़े हैं
द्वारे आम और नीम के पेड़ खड़े हैं
बाबूजी,हमारे घर एकदम खुले
न मजबूत दरवाजे न ज्यादा सामान
चोरी का कोई डर नहीं,क्यूंकि
चोरी लायक आप लोगों ने
हमारे घरों में कुछ छोड़ा ही नहीं

दो चार बर्तन,मिट्टी के कुछ घड़े
दो चार कपडे,गोबर की महक
सुखी हुई रोटियाँ,आलू प्याज की तरकारी
घारी में ही घर और घर में ही घारी
यही है हमारी छोटी सी संसारी

इसपर,मौसम भी हम पर होती
खूब मेहरबान,सावन का टपकता छप्पर
माघ माह की फटी हुई चद्दर
जेठ में झड चुकी कमीज और धोतर
मानो हमारा मजाक उड़ा रहे हों

बाबूजी, कटिया अभी ख़त्म ही हुई है
पर घर की सारी फसल बिक चुकी
कमाई के सब हाथ थक चुकीं
अब तो भूख भी हमारी नहीं रही
उसपर भी खूब कमाई हो रही

बाबूजी हमारे त्यौहार भी अब
हमसे दूर हो गए हैं ,बड़ों के त्योहारों में
हमारे त्यौहार कहीं खो गए हैं
अब, इक दिया जलाकर,बताशे और गुड
की मिठास से हम मनाते हैं दिवाली,
चुटकी भर गुलाल से पूरी होती हमारी होली

खैर छोड़िये ……….
बाबूजी, ये है भिखिया,मेरा छोटा भाई
इसके बच्चे हैं चार,पर सबकी हालत बेकार
कोई बीमार पड़ जाए,नहीं हो पाता उपचार
अस्पताल है आठ कोस पर,वो भी एकदम बेकार

बाबूजी,आप सोच रहे होंगे हम साफ़ सुथरे क्यूँ नहीं ,
पर दो जोड़ी कपड़ों में,मिट्टी की गोद में
दिनभर रोटी की जद्दोजहद और भागमभाग में
खुद को साफ़ रख पाना,कोई मजाक सा लगता है
यह हकीकत है कोई फ़िल्मी दुनिया नहीं,यहाँ
हमारी धोती दूध सी सफ़ेद नहीं,मटमैली ही होती है

बाबूजी हम भी अपने बच्चों को
खूब पढ़ाना,बड़ा बाबू बनाना चाहते हैं
पर,बिना कॉपी किताब,रात ढिबरी की
रौशनी में,दिन में जानवरों के साथ
निरुत्साही मास्टर और गैरजिम्मेदार स्कूल में
खाली पेट पढना,बड़ा बाबू बनना,आसान नहीं

बाबूजी हमे भी खुले में जाना
कुछ अच्छा नहीं लगता,
पर क्या आप अपने घर में
इक हज़ार में शौच बनवा सकते हैं,
बाँस की टाटी से आँड बना काम चला सकते हैं

बाबूजी,हमारे दोस्तों से मिलो
ये है मंगरू,चिलबिल,कोइल,घसीटा
सब के सब मेरे जिगरी मीता
मेहनत मजदूरी करके सब जीते
पर जब मालिक नाम पुकारते
नाम में उनके चार चाँद लग जाते
मंगरुआ,चिल्बिलवा,कोइला बन जाते
मेरा लहू खौल सा जाता,इक प्रश्न मन में उठता है
क्या आपके नाम के साथ कभी ऐसा होता है ?

बाबूजी बारह साल का मेरा लड़का मुझसे पूंछता है,
हम गरीब कैसे बने,गाँव में हम पिछड़ कैसे गए
मैं निपट गँवार क्या जानू?बाबूजी आप ही बता दीजिये …..

रविवार, 26 सितंबर 2010

सेक्स की कडुवाहट

सेक्स का मजा वो नहीं लेतीं
जो मजबूरन अपने आप को
किसी दरिन्दे के आगे परोसती हैं
जिनका एक ही दिन में
कई बार चीर हरण होता है
जो चन्द पैसों के लिए किसी के
हवस का शिकार बनती हैं

सड़क किनारे,ट्रक के नीचे
खुले आसमां में सोने वाले
झुग्गी झोपड़ी में रहने वाले
गर्मी में,पसीने से तरबतर
ठंढी में,हड्डी तोड़ देने वाली
कपकपाहट झेलने वाले
क्या जाने सेक्स का मजा

दस बाई दस के कमरे में
रहते जहां कई लोग,
वहाँ भला कैसे कोई
ले सकता है सेक्स का भोग
कचड़े की कब्रिस्तान और बड़े
नालों पर बसे ये लोग
इनके घरों में सबके लिए
अलग अलग कमरे नहीं होते
घरों में पंखे बिजली नहीं होते
ऐयाशी के लिए दारु शराब,
संगीत की व्यवस्था नहीं होती,न
ही होते हैं ऐशो आराम के साधन

ये वो खुशकिस्मत नहीं
जो चारदीवारी में सुकून
की जिंदगी जी रहे हों और
हम समझते हैं की ये सिर्फ
बच्चे पैदा करना जानते हैं
पैदा करके छोड़ देते हैं
समाज पर बोझ बनने के लिए
हमें हैरां-परेशा करने के लिए

और उस माँ के बारे में
हम कभी नहीं सोचते,जो
हमारे ही गैरजिम्मेदाराना
सिस्टम के चलते,अपने
दो बच्चे पहले ही खो चुकी है

रविवार, 12 सितंबर 2010

मेहनत

हल चलाकर खेतों में जो
मेहनत की फसल उगाता है
पत्थर चट्टानों में भी जो
नवनिर्माण के सुर भर जाता है
जलती भट्ठी,घुटती खदानों में,
जीवन की बाज़ी लगाता है
दिन रात परिश्रम करके वो
हम सबकी भूख मिटाता है
क्या भाग्य कहेंगे उसका भी,
वो खुद भूखा रह जाता है

बंधुआ बनकर जीवन उसका
रुखा सूखा कट जाता है
दिन रात मजूरी करके भी वह
इक घरौंदा बना नहीं पाता है
ए भाग्य विधाता तुने भी ये
दुनिया क्या खूब बनाई है
कुछ के आँखों में तारे हैं,
कुछ आँखों में खूब रुलाई है

यह देख बड़ा दुःख होता है,
मानव ने मानवता भुलाई है
सत्य अहिंसा मेहनत की बातें
लोगों ने दिल से हटाई है
अब बेईमानी,मक्कारी और
ऐयाशी की हरियाली छाई है
मेहनत करने वालों की तो
सूरत अब और मुरझाई है

पहले न कभी इतने अम्बानी
और टाटा आबाद हुए
और न ही कभी इस भूमि पर
इतने गरीब बर्बाद हुए
इन लोगों ने ही मिलकर
मेहनत की कमाई दबाई है
लाखों को रौंद कर मुट्ठी भर ने
अपनी दुनिया बसाई है
यह कहना गलत नहीं होगा,
बन गया वो आज कसाई है

शुक्रवार, 13 अगस्त 2010

जिंदाबाद....

गरीबी,भूख,शोषण,उत्पीडन,
भेदभाव,दंगे,गन्दगी,भ्रष्टाचार,
इन सबने किया भारत को लाचार
यह देश हुआ है शर्मसार

ऐ देश के गद्दारों,कायरों,भ्रष्टों,
अमीरों,इंसानियत के दुश्मनों,
सफ़ेद पोश शैतानों,
देश को कहाँ पहुंचा दिया
इसकी आबरू को सरे
बाज़ार नीलाम करा दिया
फिर भी कलेजा नहीं भरा,
जो इसे चीड खाने पर उतारू हो
तुम सब दिलो-दिमाग से बीमारू हो
ये मत पूँछ तेरे लिए हमारे
अन्दर कितनी नफरत है
न तू कभी समझ सकेगा,
न हम कभी बता पायेंगे

आखिर कितनी दूर है विकास की परछाई
कितनी गहरी है गरीबी की खाई
जो इन साठ सालों में न पट पायी
ऐ भगत,आज़ाद के लाडलों,
देश के चारागों....
अब तो खामोशी तोड़ो,
मुट्टी बंद कर जिंदाबाद बोलो
देश को सच्ची आज़ादी की तरफ मोड़ो

जिंदाबाद....

रविवार, 1 अगस्त 2010

कुछ अनचाहे प्रश्न

कुछ अनचाहे प्रश्न जो
अक्सर मुझे झकझोरते हैं
हैरां-परेशाँ करते हैं...

इन्सान इंसानियत से दूर क्यूँ
हैवान बनकर करता बड़ी भूल क्यूँ
मंदिर-मस्जिद बने कमाई के अड्डे क्यूँ
चारों ओर लगे शराब के भट्ठे क्यूँ
ठाकरे-मोदी जैसे चेहरे हो रहे आम क्यूँ
सांप्रदायिक दंगे हो रहे दिन रात क्यूँ
गौतम-गाँधी का मिट रहा नाम क्यूँ

क्यूँ हो रही घाटी बेचैन है
दंतेवाडा के किसी घर में नहीं चैन है
फौजियों के शोषण पर नहीं
कोई लगाम क्यूँ
सरकार इसपर है चुपचाप क्यूँ

क्यूँ जज्ज को "मेलोर्ड" कहना पड़ता है
पुलिस से हमेशा डरना पड़ता है
क्यूँ कोई बिना कुछ किये ही
सालों जेल में सड़ता है
और कई बहुत कुछ करके भी
मजे से जीवन में उड़ता है

क्यूँ बाहर से अनाज आयात हो रहा
जब देश में ही अनाज है सड़ रहा
क्यूँ महंगाई है सर पर नाच रही
अमीरों को क्या फिक्र उनपर तो
थोड़ी सी भी है आंच नहीं
क्यूँ लक्ष्मी,लक्ष्मी के पास जाती हैं
गरीब को गरीबी में सताती हैं

किसान बेचता आलू
पांच रुपये किलो
हल्दीराम कमाता उसी
एक किलो से पांच सौ क्यूँ
क्यूँ किसान आत्महत्या
करने को मजबूर है
क्या उसका नहीं कोई वजूद है

आज भी बच्चा भूख से है मर रहा
तो ये कॉम्मन वेल्थ है क्यूँ हो रहा
पानी की तरह आम जन का
ये वेल्थ क्यूँ बहाया जा रहा
समझ नहीं आता ये
खेल क्यूँ कराया जा रहा

क्यूँ शिक्षा महँगी हो रही, हमें
सौगात में रिक्शा ही मिल रही
क्यूँ आमिर का बच्चा ही
डी.पि.अस,सी.ऍम.अस में पढ़ रहा
हमें क्यूँ नहीं ये हक मिल रहा

कोई माँ अपना बच्चा
बेचने पर मजबूर क्यूँ
चंद पैसों के लिए कोई
महिला शारीर बेचे है क्यूँ
ईंट-भट्ठे पर बच्चों का
जीवन होता नीलम क्यूँ
साठ साल से देश
खामोश हो, सो रहा क्यूँ

क्यूँ मंत्री के बच्चे,
बिना कुछ किये ही
मंत्री बन जाते हैं
और मेहनतकश,समाज
से जुड़ा हुआ
संत्री भी नहीं बन पाता है
कैसे एक नेता पांच साल में
करोड़-पति बन जाता है
क्या वो कभी लौटकर
जनता के बीच भी जाता है
संसद में ये सब सुनाई
देता नहीं क्यूँ

क्यूँ तस्लीमा छुप कर
जीने को मजबूर है
और जिनको छुप कर
जीना चाहिए वो सीना ताने,
अपने आप में मगरूर हैं
क्यूँ देश का पैसा स्विस बैंक
में कोई दबाये बैठा है
हवाला के जरिये करोड़ों का
बाजार फैलाए बैठा है

ऐश्वर्या ने कौन सी साड़ी पहनी
यह पहले पन्ने पर छपती है
कोई मजदूर अपने हक के लिए
महीनो से धरने पर बैठा है
यह खबर क्यूँ नहीं बनती है

घर-घर मोबाइल है पहुँच रहा हुजूर
पर महिलाएं आज भी खुले में
जाने को हैं क्यूँ मजबूर
इसका कोई उत्तर देता क्यूँ नहीं

क्यूँ किसी माँ के छाती में
दूध उतरता नहीं
क्यूँ किसी आमिर का
पेट कभी सिकुड़ता नहीं
क्यूँ कोई अपने जन्दीन पर
लाखों खर्च कर देता है
और क्यूँ लाखों को अपना
जन्मदिन भी नहीं ज्ञात होता

हमारी आबादी है एक अरब,फिर
अदब के इंसान सिर्फ मुट्ठीभर,क्यूँ
कुछ अनचाहे प्रश्न जो अक्सर मुझे
झकझोरते हैं
हैरां-परेशाँ करते हैं...

सोमवार, 26 जुलाई 2010

बाबा का चक्कर

आज हमारी शिक्षा बढ़ रही
हमारे ज्ञान का दायरा भी बढ़ रहा
फिर हमारी सोच पर है पहरा क्यूँ लग रहा
अंधविश्वास है क्यूँ बढ़ रहा है
ढोंगी बाबाओं का जाल है क्यूँ फ़ैल रहा

शेयर मार्केट का "बुल" हो
या फूटबाल का "ऑक्टोपस"
या उड़न तश्तरी दिखने की बातें
हम कितनी आसानी से बहक जाते हैं

घर से निकलने से पहले देखते हैं राशि
कई पाप करने के बाद जाते हैं काशी
दिमाग के किसी कोने में पैठ जमाये
बैठी मान्यताएँ हमें बताती हैं की
आगे मत बढ़ो,बिल्ली ने रास्ता काट दी
बच्चे ने छींक दी,अभी रुक जाओ
आज घर से बाहर न निकलो दिशाशूल है
आह! हम कितने शिक्षित हैं

गुरु के कहने पर हम नाम लेते हैं बदल
उँगलियों में कई अंगूठियाँ लेते हैं पहन
गृह दोष पता चले तो तुडवा देते हैं घर
पर नहीं कोई परहेज छुपाने में कर

किस दिन कौन सा
रंग पहनना चाहिए
क्या भोग लगाना चाहिए
कौन से राशि वाले को
कौन सा पेड़ लगाना चाहिए
कहाँ जाना,क्या करना चाहिए
ये सब बाबा हमें बताते हैं

कब कौन सी सरकार बनेगी
कौन सी टीम जीतेगी
सगोत्रीय शादी पाप हैं
बच्ची होने में महिला का ही हाथ है
ये सब भी बाबा बखूभी हमें बताते हैं

समाचार चैनलों पर बढ़ रहे
बाबाओं की संख्या, हमारे
अंधविश्वासों को और पुख्ता कर रहे
हर चैनल के पास अपने कई बाबा हैं
सब के सब एक्सपर्ट,एक से बढ़कर एक
इन बाबाओं के पास हर मर्ज की दवा है
बस एक फ़ोन करिए और मर्ज की दवा पाइए
हमारे पास भी उनके तर्कों को मानने का
हर वैज्ञानिक तर्क मौजूद है

काश ये बाबा लोग किसी
मंगरू, भिखिया की भी तकलीफ
सुन सकते,और उन्हें दूर कर सकते
न वो गरीबी में जीते न भूखों ही मरते

हम गांववालों को गंवार कहते हैं
कहते हैं वो "अन्धविश्वासी" "अनपढ़" हैं
वो कोई गाँव नहीं था जहाँ हमने
भगवान् गणेश को दूध पिलाया था
न ही उस तट पर कोई गाँव बसा था
जहां समुन्द्र का पानी मीठा हो गया था


हम अंधे हो जाते हैं, या फिर
अँधा होने का ढोंग करते हैं
या फिर अँधा बने रहने में ही
अपनी भलाई समझते हैं
हम आज ज्यादा ही शिक्षित हो गए हैं

कुछ दिन में बाबा लोग ये भी बताएँगे की
हमें कब और कितनी सांस लेनी है
वाह बुद्धिजीव....
दूसरों पर हंसने से पहले खुद को तो देख

गुरुवार, 22 जुलाई 2010

आदत...

आदत डाल लो,
समस्या जड़ से ख़त्म हो जायेगी
इसलिए,आदत डाल ली हमने
भूख से लड़ने की आदत
भय में जीने की आदत
गरीबी से जूझने की आदत
प्रताड़ित होने की आदत
कड़ी धुप में पत्थर तोड़ने की,
खेत गोड़ने की,झुलसते हाथों से
भट्टी में कोयला झोंकने की,
फूटपाथ पर नंगे बदन सोने की,
रात को थकावट दूर करने के लिए
नशा लेने की,
आदत डाल ली हमने...

सदियों से आदत डाली गयी,
खामोश रहकर जीने की
सर झुकाकर चलने की
अन्याय सहते रहने की
कहा गया इसी में भलाई है
आदत डाल लो वरना
जीवन भर पिटाई ही पिटाई है
आदत डाल ली हमने...

महल,बंगले बनाते हम
झोंपड़ी भी नसीब नहीं हमको
सड़के-बाँध बनाते हम
बेघर किया जाता हम्ही को
सरकार चुनते हम
शोषण होता हमारा ही
आदत डाल ली हमने...

जेनरल बोगी में,जानवरों की तरह
सफ़र करने की,मरकर जीने की
एक घड़े पानी के लिए
घंटों लाइन में लगने की
बेड ना मिलने की वजह से
अस्पताल के गेट पर दम तोड़ने की
मास्टर से मार-गाली खाने की
आदत डाल ली हमने...

कई लड़ाइयाँ जिताई हमने,
नाम हुआ सेनापति का
कई बलिदान दिए हमने,
अमर हुए नेहरु,पटेल
कई कारखाने खड़े किये हमने,
नाम हुआ सिर्फ मालिक का
कोई गम नहीं,हमने
इसकी भी आदत डाल ली

तुमने भी आदत डाली
शैम्पैगं,व्हिस्की,सिगार,चरस,
कोकीन पीने की,सबसे ख़ास
गरीब का खून पीने की ...
तुमने आदत डाल ली
हमें रौंदते हुए आगे बढ़ने की
हमारे इज्जत से खेलने की
ऐयाशी और आराम करने की
हमें अँधेरे में रखने की

बहुत हुआ अब
हम भी आदत डाल रहे हैं
इस आदत को बदलने की आदत
अब डाल रहे हम नयी आदत
अपने हक़ के लिए लड़ने की ,
अन्याय न सहने की ,
अपने अधिकारों को पाने की
सीना तान कर चलने की
सूर्य की लालिमा में जीने की
हम डाल रहे हैं नयी आदत ...

मंगलवार, 29 जून 2010

ऐ बारिश अब देर न केर.....

ऐ बारिश,तू बड़ी बेदर्द है
कड़ी परीक्षा लेती है
नयनों के नीर सुखाती है,
देख,ये सूखे वीरान खेत,
हैं तुझसे लिपटने को बेताब
ये गर्म हवाएँ भी अब तो
तुझसे ठंढक हैं चाह रहीं
ऐ बारिश अब देर न कर .....

ये नदियाँ,झरने,ये जंगल
सब हैं तुझे पुकार रहीं
कोयल,मोर और गौरैय्या
हैं सब तेरे स्वागत में खड़ी,
तेरी बाहों में झूम-झूमकर
ये हँसना खेलना चाहती हैं
अपनी जादुई बूंदों से,अब
इनकी चाहत को पंख लगा दे
नव जीवन का वर तू दे
ताकि ये फिर नए वेग से
लह-लहाकर गा सकें
गीत अब बरसात का
मेघ तेरे आने का
ऐ बारिश अब देर न कर .....

बीत गया जेठ अब अषाढ़ है आ गया
टूट गया है धैर्य किसान का
अब आम जन भी निराश है
अपना स्नेह तो अब बरसा दे
खेत बाग़ की प्यास बुझा दे
ऐ बारिश अब देर न कर .....

एक और गुजारिश भी है तुझसे
तू प्रकृति की जीवन दायिनी
तुझसे हासिल बहुत कुछ सबको,पर
जब तू घोर गर्जना करती है
अपना प्रचंड रूप दिखलाती है
दुनिया ये सहम सी जाती है
जग की पहिया रुक जाती है ....

देख उन पगडंडियों किनारे बसा
वो छोटा सा गाँव,उस सड़क किनारे
बसे वो लोग,वो मजदूर और किसान
तेरी तीखी बूंदों की मार नहीं सह पायेंगे,
जैसे-जैसे तेरा वेग बढ़ता है
वैसे-वैसे इनके आँखों से
मोती सा नीर टपकता है....

अरे,जिनके तन कपडे ही नहीं
छप्पर भी छलनी हैं जिनके
ये वो खुशकिस्मत नहीं
जो चाय की चुस्कियों के साथ
तेरा स्वागत कर सकें
ये वो हैं जो कीचड़ भरे खेत में
जोंक लगे पाँव में,धूप छाँव
कि आँख-मिचौली में
कजली गाते जाते है
जीवन का राग सुनाते हैं
इनके प्यारे मनुहार को
अब तो नज़रंदाज़ न कर
ऐ बारिश तू हौले से आना
सबकी प्यास बुझाकर जाना
ऐ बारिश अब देर न कर ...
ऐ बारिश अब देर न कर ...

गुरुवार, 20 मई 2010

मुखौटा

मैं थक गया हूँ,अपने आप से
टूट चूका हूँ अपने ही स्वार्थ से
जो सपने देखे थे,जो अरमाँ सजाये थे
सब एक एक कर टूट रहे....

सोचा था ये करेंगे,सोचा था वो करेंगे
पर मेरी लालच ने,हर कदम पर मुझे रोका
मैंने झूठ बोला,आज भी बोल रहा हूँ
अपने आप से,इस समाज से
कई मासूमों से,कई आँखों से
तरह तरह का चोला पहनकर
घूमता रहा बेबाक,असली चेहरा छुपा
सबको धोका देता रहा...

मैं कहता रहा अपने आप से
आज नहीं तो कल सही,कुछ करुँगा जरूर,
अपने गाँव के लिए,इस समाज के लिए,
पर मुझसे कुछ न हो पाया....

न पैसे जोगना मेरा उद्देश्य था
न वैभव,विलास की ही मुझे चाह थी
पर जिंदगी की बनियागीरी ने,
मूल्य की चाहत ने मुझे
मूल्यहीन कर दिया है अब,
जीवन की राग में ऐसे खोया
कि,दूसरों की सेवा क्या करता
खुद की सेवा में खूब रमा मैं

मुखौटा लगाकर किये गए
मेरे कई नाटक, कईयों को
दिखाए हुए हसीं सपने
अब दर्द कर कराह रही हैं
परत दर परत,मुझ पर
लगा मुखौटा उतर रहा है

झूठ का चोला कई रंग का,
कई ढंग से,कई दिनों से पहना मैंने
अब ये चोला उतर रहा
इसका रंग फीका पड़ रहा...

वादे करना बहुत आसान है
उन्हें निभाना उतना ही मुश्किल
अब मैं कुछ न कर पाउँगा,
न ही मुझसे कुछ हो पायेगा
मेरे अँधेरे तन मन में
खंडहर वीरान से इस जीवन में,
कई दिनों से सीने में अब
असहज दर्द बना रहता है

यह पीर अब असहनीय है
आज पंख-हीन हूँ मैं पंक्षी
अब तो स्वछंद रूप से
मेरा उड़ना मुश्किल है...

अचरज से क्या देख रहे तुम,
यह तेरी मेरी कहानी है
ये मुखौटा ओढ़े हुए मैं हूँ,तुम हो
ये हम में से कोई भी हो सकता है..

रविवार, 9 मई 2010

टिप...

कल रिक्शेवाले से मेरा झगडा हो गया
वो मुझसे एक रुपैया ज्यादा माँग गया
मैंने अपना आपा खो दिया, उसे
एक साँस में कई गालियाँ दे गया
तब लोगों ने बताया की
किराया कल से बढ़ गया
मैं झल्लाया हुआ, पैसे फ़ेंक
वहाँ से आगे बढ़ गया

रात को बीवी के साथ होटल गया
खूब मजे से पीया खाया
दो लोगों में मैंने
एक हजार का बिल चुकाया
वेटर को बिना कहे
सौ रुपये का टिप पकड़ाया
हर्षोल्लासित घर वापस आया

शनिवार, 1 मई 2010

लूट का खेल

चली आ रही प्रथा सदा से
लूट का है यह खेल यदा से
लूटा गया, लुटवाया गया
लूटने वालों ने कल भी लूटा
आज भी हैं ये लूट रहे

लूट के लुटेरे मिलकर लूटते
खुले आम बड़े विश्वास से लूटते
निर्भीक बेनिडर हो लूटते
लूट की ऐसी लूट मची रे
लूटन में मजा बड़ा रे भैया
लूटन में रम गए लुटेया
तन से, मन से,धन से लूटा
आदमियत और इंसानियत को लूटा

कल की तो तुम बात ही छोड़ो
आज के इन हालात को देखो
लूट को ऐसी छूट मिली की
लूटने में भी लूट लगी है
कई लुटेरे अब दिखते हैं
मंदिर से संसद तक बैठे
अम्बानी, मोदी, स्वामी तो
मुट्ठीभर कुछ चेहरे हैं
ऐसे लुटेरे मिल जायेंगे
गली गली हर कूचे में

लूट का बाज़ार खूब चला है
मिलकर लूटो, खुलकर लूटो
दिन में लूटो, रात में लूटो,
शहर में लूटो, गाँव में लूटो
ख़ास को छोड़ो, आम को लूटो
राम रहीम के नाम पर लूटो
विकास कार्य के नाम पर लूटो
भूख प्यास के नाम पर लूटो
बाढ़ तूफ़ान में जमकर लूटो
जीने के अधिकार को लूटो

आज लूट आधारभूत बन गयी
पसीने से सनी कमाई लुट गयी
आज लूट इस हद तक पहुँची
अब जीने की चाहत है लुट रही

गुरुवार, 15 अप्रैल 2010

मरती हुई बुनियादी शिक्षा

माननीय शिक्षा मंत्री जी
चलिए मैं ले चलूँ आपको मेरे स्कूल
नाम है स्कूल का " पाठशाला की मस्ती"
पड़ता है यह जिला नामक बस्ती में
पर स्कूल की हालत है बड़ी खस्ती
शिक्षा में नहीं यहाँ कोई चुस्ती
शिक्षकों में दिखती है आम सुस्ती
मंत्रीजी स्कूल की ऐसी हालत
तो नहीं है जँचती
हमारा भविष्य भी, सरकार
मजाक में ही है रचती
हमारे साथ ये
कैसा खिलवाड़ करती?

मंत्री जी यहाँ के स्कूलों में, बच्चे
मास्टर जी को बुलाने जाते
उनकी मनुहार करते, की
गुरूजी आप स्कूल चलते
हम भी पढ़ते लिखते
हमारे भी भविष्य खिलते
हम भी दुनिया से मिलते
मुद्दों पर बाते करते
कविता किताब लिखते
औरों से कंधे से कन्धा लड़ाते
बेनिडर बाबू-साहेब से बतियाते
शायद वह भी हमसे कुछ डरते
हमें भी इंसान समझते और
हम अपने अधिकारों की
रक्षा स्वयं करते
गुरूजी काश आप पढ़ाने चलते....

मंत्री जी, बच्चे कहते
मास्टरजी...
आप ऐसे ना अंगराइए
कुछ तो हमें बतलाइये
क ख ग तो सिखलाइये
छुट्टी के बाद आराम फरमाइए
अभी तो हमें पढ़ाइये
हमारे मन की गुत्थियों को सुलझाइये
कभी तो हमसे इमला लिखवाइए
हमें भी बड़ा अफसर बनवाइए
मास्टर जी आप हमें
ऐसे ना फुस्लाइये...

मंत्री जी हम आपसे पूछना चाहते हैं
शिक्षा में इतने सारे भेद
इस बात का है बड़ा खेद
कुछ समझ नहीं आया यह खेल
हमारे स्कूल इतने टूटे फूटे
इतने छोटे क्यों हैं

स्कूल में कक्षाएँ पाँच पर
मास्टर सिर्फ एक वो भी बड़े नेक
मैं आज भी नहीं समझ पाया
की कक्षा पाँच में भी
मुझे जोड़ घटाना क्यूँ नही आया
इसका राज मुझे कोई मास्टर
आज तक क्यों नही बता पाया

मंत्री जी शायद आपको
मेरे ये प्रश्न नहीं भाये
कोई बात नहीं,
पर मंत्री जी समझ नहीं आता
क्या आपका बच्चा स्कूल में
कभी है मार खाता
फिर हमें मास्टर मारते क्यों है
हमें गरियाते क्यों हैं, हमसे
अपने हाथ पैर दबवाते क्यों हैं?

मंत्री जी हमारे कपडे साफ़ क्यों नहीं रहते
उनसे गोबर मिटटी क्यों हैं महकते
पैरों में जूते मोज़े क्यों नहीं होते
हमारे बस्ते खाली क्यों होते हैं?

मंत्री जी हमारे स्कूल में कभी
कोई बड़ा अतिथि क्यों नहीं आता
हमें कभी पिकनिक पर
क्यों नहीं ले जाया जाता
खेल कूद क्यों नहीं होता
कोई प्रतियोगिता क्यों नहीं होती
वार्षिकोत्सव क्यों नहीं मनाया जाता
हमें कंप्यूटर क्यों नहीं सिखाया जाता?

मंत्री जी हमारे स्कूल में
वाचनालय क्यूँ नहीं है
बिजली और पंखे क्यों नहीं
नल में पानी गायब क्यों है
स्कूल में शौचालय पर ताला क्यों है
मंत्री जी स्कूल खाने को क्यों दौड़ता है
शब्द उड़ते तैरते क्यों दिखाई देते हैं?

मंत्री जी एक आखिरी प्रश्न
हमें चपरासी, ड्राईवर बनने
के लिए ही क्यों पढ़ाया जाता है
हमें अँधेरे में ही जीना
क्यों सिखाया जाता है ?

आप मंद मंद मुस्कुरा रहे हैं
या खुद पर अब शर्मा रहे हैं
या अंदर ही अंदर गरमा रहे हैं
या भोली भली जनता को
फिर भरमा रहे हैं....

क्या ये आप लोगों की
सोची समझी चाल है
या फिर आप लोगों के लिए
जरूरी यह इक ढाल है
की गरीब पढ़ लिख ले
"तेरी ये मजाल है"

क्या इसीलिए आप लोग
भयंकर कूटनीति अपनाते हैं
हमें अपनों जैसा जताते हैं
हम चुप रहें इसलिए कुछ तुकडे
वजीफा के रूप में दिलाते हैं
दुपहर का भोजन कराते हैं

इसमें भी आप जनाब
हमारे ही नाम पर
अपनी ही जेबें भरते हैं
मानव होकर मानवता से
गद्दारी करते हैं
हमें शिक्षा विहीन करते हैं
कलम की ताकत को
सरेआम कुचलते हैं ॥

गुरुवार, 8 अप्रैल 2010

अफसाना

सुना था प्यार में बहुत शक्ति होती है

पत्थर में भी फूल खिला सकती है

पर किस पत्थर से दिल लगा लिया

जालिम ने मुझे आवारा पत्थर बना दिया...

मुझे तुझसे कोई शिकवा नहीं

न ही कोई शिकायत है

पर ये भी सच है की

तेरी मुस्कुराहटों को तरसुंगा मैं

तेरी आवाज को ढूढूंगा मैं

तेरी शरारतों को न भूल पाऊंगा

मीलों मील फैली तेरी खुशबू में

मदहोश लहराऊँगा मैं...

तुझे अपने आँगन में लाने का

ख्वाब नहीं बेंच पाउँगा

तुझे अपनी बाहों में समेट लेने की

चाहत को न मिटा पाउँगा

कब तक छुपती रहोगी अपने आप से

कब तक छुपाती रहोगी अपने आप को

कब तक भागती रहोगी डरकर इस संसार से...

मैंने तेरे साथ जीवन के सारे ताने बाने बुने

तेरा साथ मिलने से बहुत कुछ होना था

जीवन को विस्तार मिलना था

इक नया संसार शुरू होना था

मेरी साँसों को सुर मिलना था

सपनों को सच होना था

पर तेरी खामोशी ने....

तुझसे दूर मेरा कोई वजूद नहीं

तेरे सिवा मेरी कोई दुनिया नहीं

तेरे बिना मेरा कोई सपना नहीं

तेरे बगैर मेरा कोई जीना नहीं...

माना मेरा समय अब हीन है

हालत भी अपनी दीन है

पर हारी नहीं हैं आँखें मेरी

हारा नहीं है मेरा मन

बस तेरे इंतज़ार में

तेरे मिलन की आस में

गुजर रहे है मेरे दिन ...

तू आयेगी! ये मुझे है यकीन

तेरे इंतज़ार में ....

आँखों का नूर सजाये बैठा हूँ

कई अरमां लगाए बैठा हूँ

दिल के चराग जलाए बैठा हूँ

कहीं चराग़ बुझ ना जाए इसलिए

आँखों को छलकाए बैठा हूँ ...

अब और नहीं सहा जाता

जीने से भी डर लगता है

फिर भी बड़े उत्साह से

हमने ये जुर्रत की है

कि तुझसे मिलने की चाहत की है

कुछ बीज सपनों के मैंने भी बोये हैं

उन्हें फसल बनने का तू इक मौका दे दे

इस मुर्दा जिस्म को तू जिंदगी बक्श दे....

शनिवार, 3 अप्रैल 2010

आज़ादी...??

हम आज़ाद देश में रहते हैं

आज़ादी का बिगुल बजाते हैं

एक कंपनी से आज़ादी पायी

आज कइयों सर पर बैठे हैं...


घर के चिराग अपने नेता

घर में ही आग लगाते हैं

लोगों का पैसा गायब कर वो

अपनी जेबें भरते हैं

पशुओं का चारा खाया था

बच्चों का चारा भी खा ये रहे

मेहनत मजदूरी करने वालों को

पल-पल की मौत ये मार रहे...


अमीर का पेट बढ़ता ही रहा

गरीब का पेट हो रहा गायब

किस आज़ाद देश मे होता है

की बच्चा भूख से मरता है...


जहाँ सूखे मुरझाये खेत देखकर

किसान का प्राण पखेरू उड़ जाता है

ये आज़ादी कैसी है

जहाँ भीषण शोषण फैला है ...


इस आज़ादी के साठ साल में

हमने क्या-क्या पाया है

शिक्षा को बाजारू कर दी

डॉक्टरों से धंधा कराया है...


भूख से मरते लोग वही जो

हमको भोजन देते हैं

प्यास से मरते लोग वहीँ के

जहां से नदियाँ बहती हैं...


पानी को बोतल में बंद कर

ये नया ज़माना लाये हैं

अरे, ऐसी आज़ादी का क्या करना

आँसू जहाँ हर आखोँ में...


खैरलांजी जहाँ रोज हो रहा

नारी लज्जित पड़ी हर कोने में

इस आज़ादी का क्या मतलब

गरीब जहाँ प्रताड़ित है...


गाँधी जी के इसी देश में

हिन्दू मुस्लिम दंगे हों

फूट डालो और राज करो की

नीति जहाँ अपनाई जाती हो...


रक्षक हमारे भक्षक बन गए

नेता-गुंडे गुंडे-नेता बन गए

लोगों के ईमान बिक गए

भाई तो भाई से भीड़ गए

नफ़रत की ऐसी आंधी चली

अब प्यार पर पहरे लगते हैं

घोर अँधेरा पसरा है

आज़ादी के इन साठ सालों में...


अरे, इनसे बेहतर गोरे थे

कहने को अपने पराये थे

पर इन शैतानों को क्या कहें

जो अपनों का शोषण करते हैं...


आज़ादी में हम जी तो रहे

पर कैद हमारी दुनिया है

क्या इसे आज़ादी कहते हैं

जहाँ अभी हज़ारों रूढ़ियाँ हैं...


घोर निराशा छाई है

जीने का एहसास मिट रहा

आँखों का है तेज मिट रहा

मन की उमंगें ख़त्म हो रही

अब तो हवाएँ भी दूषित हैं

भटकन दिशाओं में फैली है

घनघोर अँधेरा छाया है

ये आज़ादी अभिशाप बन गयी...


अरे, आज़ादी आज़ादी है

कुछ बनियों की जागीर नहीं

असली आज़ादी लायेंगे हम

आज नहीं तो कल सही...


अपने स्वदेश के वास्ते

बिस्मिल भगत के वास्ते

आज़ाद की धरा पर

आज़ादी हैं हम चाहते...


वो भोर सुहानी लायेंगे

है तरुणों की ललकार यही

हम क्रांति का बिगुल बजायेंगे

पाने अपने अधिकार सभी...

"आवारा राही"




मंगलवार, 30 मार्च 2010

पेड़....!!!!

मैंने एक बाग़ लगाया है,

आम, बेल, नीम कई पेड़ हैं उसमे

बड़े अरमानो से यह बाग़ लगाया है...


बसंत में देखते ही बनता है

किसी सजी हुई दुल्हन से

कम नहीं लगते ये पेड़

देखो कैसे झूम रहे हैं...


उनकी छाहँ में बैठ कर देखो

कड़ी दुपहरिया में भी

चांदनी शीतलता का एहसास होगा

तुम्हे शायद यह सब अजीब लगे पर

मैं रोज इन पेड़ों से ब़ाते करता हूँ

अपने सुख दुःख कहता हूँ

मन को बहुत सुकून मिलता है...


इन्ही पेड़ों पर खेलकर

कईयों के बचपने बीते है

इन्ही पेड़ों के नीचे बैठकर

पथिकों के थकान मिटे हैं

इन्ही पेड़ों पर कई चिड़ियों ने

प्यारे आशियाने बनाए हैं...


पर यह सब मैं तुम्हे क्यूँ बता रहा हूँ

सुना है तुमने कुछ और तरक्की कर ली है,

सुना है तुमने एक ऐसे मशीन की इजाद की है

जो एक ही वार में पेड़ को जड़ से अलग कर देती है...

रविवार, 28 मार्च 2010

गुस्सा...!!!

बहुत गुस्सा आता है...
जब एक मालिक अपने
नौकर को डांटता है

जब एक आदमी अपनी
औरत को मारता है...

जब रिश्वत देनी पड़ती है
जब बाजार में खड़े हजारों लुटेरे
हमारी जिंदगी को लूट लेते हैं
जब कोई अमीर पैसे के बल पर
हमारी काबिलियत को लात मार देते हैं....

बहुत गुस्सा आता है...
जब लोगों के पास रहने के लिए
एक नहीं कई बंगले होते है

पर ठंढी, बरसात में कई लोग
सड़क पर बेसहाय मर रहे होते हैं...

बहुत गुस्सा आता है...
जब किसान आत्महत्या
कर रहा होता है

और देश में कुबेरपतियों की
संख्या बढ़ रही होती है

जब विश्व स्तर का विश्वविद्यालय
बनाया जाता है

पर गाँव के विद्यालय में
शिक्षक ही नहीं होता है....

बहुत गुस्सा आता है...
जब रोज़गार गारंटी योजना बनती है
पर इसकी कोई गारंटी नहीं की
योजना ठीक से भी चलती है

जब गोदामों में अनाज
खराब हो रहा होता है

वहीँ देश का भविष्य
भूख से मर रहा होता है ....

बहुत गुस्सा आता है...
जब इलाज के अभाव में
गरीब को मरना पड़ता है
सहम कर रह जाता हूँ
जब चंद पैसों के लिए
माँ को अपना बच्चा
बेचना पड़ता है
...

बस घुंटकर रह जाता हूँ
घर वाले कहते
दबकर रहो नरम बनकर रहो
यार दोस्त कहते
खामोश रहकर जियो
नहीं तो सदा के लिए
खामोश कर दिए जाओगे...

पर कब तक, कब तक युहीं सहते रहे
सहम सहम कर रोज की मौत मरते रहे ..
क्या अब इस देश में भगत, आज़ाद जैसे
अंगार नहीं रह गए ...



हम सब बनिया बन गए हैं

हमने तोह बाढ़ और सूखे से भी

मुनाफाखोरी कमाना शुरू कर दिया है

वाह रे इंसान...

तू ऐसे ही तरक्की करते जा

मानवता को बेंचते जा और

अपना घर भरते जा...

शनिवार, 27 मार्च 2010

भारत तेरी जय हो

भारत तेरी जय हो, नहीं कहूँगा...
जात पाँत में जकड़ा हुआ,
भेद भाव से त्रस्त यह देश
धर्म का जहर है घुला हुआ
कुंठित सा दिखता यह देश
भारत तेरी जय हो, नहीं कहूँगा...

जहां राजनीती की रोटी सेंकने के लिए
प्रांतवाद, जातवाद, भाषा और धर्म का
सहारा लिया जाता हो,
जहां लोकतंत्र मर चुकी हो और
प्रेस पूरी तरह बिक चुकी हो
तुम ही कहो कैसे कहूँ भारत तेरी जय हो...

जहां रक्षक ही भक्षक बन बैठे हों,
मानवता को खुलेआम कुचलते हों
जन सामान्य के लिए बनने वाली योजनाये
मुट्ठी भर के कमाने की कुंजी बन जाती हों
भारत तेरी जय हो...यह कहते नहीं बनता

जहां गोदामों में अनाज बर्बाद हो रहा हो
पर देश में ही लोग भूखे मर रहे हों
जहा कुछ मुट्ठी भर गरीबों को कुचलते हुए,
दुनिया के अमीरों से आगे निकलते जा रहे हों
जहां फ़ोन, कंप्यूटर, टीवी, गाड़ी सस्ती होती जा रही हो
रोटी, पढाई, दवाई किसानी महँगी होती जा रही हो
तुम ही सोचो ... क्या कह सकते हो भारत तेरी जय हो

जहाँ सेज, माल्स जैसे शैतान बनाए जा रहे हों
पूंजीवाद सर चढ़कर बोल रहा हो
अम्बानी, टाटा सरकार से बड़े हो गए हों
क्या तुम कहोगे... भारत तेरी जय हो

जहां आज भी लोग सर पर
मैला ढोने को मजबूर हों
जहां आज भी बंधुआ मजदूरी
सरेआम होती हो
जहाँ बच्चों का बचपना
गयाब कर दिया जाता हो
माफ़ करना दोस्त
नहीं कहूँगा भारत तेरी जय हो...