मंगलवार, 30 मार्च 2010

पेड़....!!!!

मैंने एक बाग़ लगाया है,

आम, बेल, नीम कई पेड़ हैं उसमे

बड़े अरमानो से यह बाग़ लगाया है...


बसंत में देखते ही बनता है

किसी सजी हुई दुल्हन से

कम नहीं लगते ये पेड़

देखो कैसे झूम रहे हैं...


उनकी छाहँ में बैठ कर देखो

कड़ी दुपहरिया में भी

चांदनी शीतलता का एहसास होगा

तुम्हे शायद यह सब अजीब लगे पर

मैं रोज इन पेड़ों से ब़ाते करता हूँ

अपने सुख दुःख कहता हूँ

मन को बहुत सुकून मिलता है...


इन्ही पेड़ों पर खेलकर

कईयों के बचपने बीते है

इन्ही पेड़ों के नीचे बैठकर

पथिकों के थकान मिटे हैं

इन्ही पेड़ों पर कई चिड़ियों ने

प्यारे आशियाने बनाए हैं...


पर यह सब मैं तुम्हे क्यूँ बता रहा हूँ

सुना है तुमने कुछ और तरक्की कर ली है,

सुना है तुमने एक ऐसे मशीन की इजाद की है

जो एक ही वार में पेड़ को जड़ से अलग कर देती है...

रविवार, 28 मार्च 2010

गुस्सा...!!!

बहुत गुस्सा आता है...
जब एक मालिक अपने
नौकर को डांटता है

जब एक आदमी अपनी
औरत को मारता है...

जब रिश्वत देनी पड़ती है
जब बाजार में खड़े हजारों लुटेरे
हमारी जिंदगी को लूट लेते हैं
जब कोई अमीर पैसे के बल पर
हमारी काबिलियत को लात मार देते हैं....

बहुत गुस्सा आता है...
जब लोगों के पास रहने के लिए
एक नहीं कई बंगले होते है

पर ठंढी, बरसात में कई लोग
सड़क पर बेसहाय मर रहे होते हैं...

बहुत गुस्सा आता है...
जब किसान आत्महत्या
कर रहा होता है

और देश में कुबेरपतियों की
संख्या बढ़ रही होती है

जब विश्व स्तर का विश्वविद्यालय
बनाया जाता है

पर गाँव के विद्यालय में
शिक्षक ही नहीं होता है....

बहुत गुस्सा आता है...
जब रोज़गार गारंटी योजना बनती है
पर इसकी कोई गारंटी नहीं की
योजना ठीक से भी चलती है

जब गोदामों में अनाज
खराब हो रहा होता है

वहीँ देश का भविष्य
भूख से मर रहा होता है ....

बहुत गुस्सा आता है...
जब इलाज के अभाव में
गरीब को मरना पड़ता है
सहम कर रह जाता हूँ
जब चंद पैसों के लिए
माँ को अपना बच्चा
बेचना पड़ता है
...

बस घुंटकर रह जाता हूँ
घर वाले कहते
दबकर रहो नरम बनकर रहो
यार दोस्त कहते
खामोश रहकर जियो
नहीं तो सदा के लिए
खामोश कर दिए जाओगे...

पर कब तक, कब तक युहीं सहते रहे
सहम सहम कर रोज की मौत मरते रहे ..
क्या अब इस देश में भगत, आज़ाद जैसे
अंगार नहीं रह गए ...



हम सब बनिया बन गए हैं

हमने तोह बाढ़ और सूखे से भी

मुनाफाखोरी कमाना शुरू कर दिया है

वाह रे इंसान...

तू ऐसे ही तरक्की करते जा

मानवता को बेंचते जा और

अपना घर भरते जा...

शनिवार, 27 मार्च 2010

भारत तेरी जय हो

भारत तेरी जय हो, नहीं कहूँगा...
जात पाँत में जकड़ा हुआ,
भेद भाव से त्रस्त यह देश
धर्म का जहर है घुला हुआ
कुंठित सा दिखता यह देश
भारत तेरी जय हो, नहीं कहूँगा...

जहां राजनीती की रोटी सेंकने के लिए
प्रांतवाद, जातवाद, भाषा और धर्म का
सहारा लिया जाता हो,
जहां लोकतंत्र मर चुकी हो और
प्रेस पूरी तरह बिक चुकी हो
तुम ही कहो कैसे कहूँ भारत तेरी जय हो...

जहां रक्षक ही भक्षक बन बैठे हों,
मानवता को खुलेआम कुचलते हों
जन सामान्य के लिए बनने वाली योजनाये
मुट्ठी भर के कमाने की कुंजी बन जाती हों
भारत तेरी जय हो...यह कहते नहीं बनता

जहां गोदामों में अनाज बर्बाद हो रहा हो
पर देश में ही लोग भूखे मर रहे हों
जहा कुछ मुट्ठी भर गरीबों को कुचलते हुए,
दुनिया के अमीरों से आगे निकलते जा रहे हों
जहां फ़ोन, कंप्यूटर, टीवी, गाड़ी सस्ती होती जा रही हो
रोटी, पढाई, दवाई किसानी महँगी होती जा रही हो
तुम ही सोचो ... क्या कह सकते हो भारत तेरी जय हो

जहाँ सेज, माल्स जैसे शैतान बनाए जा रहे हों
पूंजीवाद सर चढ़कर बोल रहा हो
अम्बानी, टाटा सरकार से बड़े हो गए हों
क्या तुम कहोगे... भारत तेरी जय हो

जहां आज भी लोग सर पर
मैला ढोने को मजबूर हों
जहां आज भी बंधुआ मजदूरी
सरेआम होती हो
जहाँ बच्चों का बचपना
गयाब कर दिया जाता हो
माफ़ करना दोस्त
नहीं कहूँगा भारत तेरी जय हो...