बुधवार, 16 अक्तूबर 2013

मरता नहीं आदमी भूख से

लोगों में भूख है, अनाज की लूट है
भूख बना भूत है कुछ पैसों से अभिभूत है

सरकार तो सरकार है, दशकों बाद भी
नहीं हुआ लोगों का भूख से उद्धार है
खेतों का मजदूर और मजबूर है, ये राज बड़ा गूढ़ है
अनाज ही अनाज है, क्यूँ सड़ रहा अनाज है
भूख ही भूख है, क्यूँ सड़ रहा समाज है

पिचका मुंह दिखे अगर नंग धडंग दिखे अगर
और यदि लगे भद्र समाज को
ये आदमी नहीं बोझ है, कामचोर है, कमजोर है
बस यही वो शख्स है जो मौत के करीब है
जो भूख से फ़क़ीर है, जो सड़कों का राहगीर है

ये मर गया तो क्या हुआ, इक और गया तो क्या हुआ
ये  कौन किससे पूछेगा, ये कौन था ये क्यूँ हुआ
मौत का ये इतिहास है  मौत का प्रचंड ये प्रकार है

मरता नहीं आदमी भूख से, बस मरता वो समाज है