बुधवार, 7 मई 2014

अच्छे दिन, अच्छों के

गंगा के तीरे उसका गाँव देखा
पेड़ पौधे, चिड़ियाँ, तितलियाँ तमाम देखा
पानी का फैला विस्तार देखा, रेतीले तट पर
बहार देखा, आज उसका घर खुले आम देखा

फूंस का घर, न दरवाज़े न ताला
ना ही भीतर दिखा कोइ सामान निराला
मिट्टी की दिखी चूल्ह, कुछ बर्तन दिखे आला
और दिखी कोनों मे मकड़ियों कि लटकती जाला

एक अरगन पर कुछ पड़े कपडे दिखे
कुछ कांच की सीसियाँ कुछ रात की ढिबरियाँ दिखीं
चूल्हे के पास पड़े जलावन की कुछ चिपरियाँ दिखीं
कुछ पुरानी सी हो चली बरेडों क़ी सिसकियाँ दिखी

कोने में लूली सी पडी इक खाट दिखी
उसपर कुछ गुदड़ी और नीचे पडी चाट दिखी
एक ही बाकस एक टूटी अटैची दिखी
बच्चोँ की दो चार फटी पूरानी क़िताबें दिखी

घुसते ही घर हो गया थ खत्म
इसी मे रहता है छः परिवारोँ का कुटुंब
ये है इनकी स्थिति, ये किसका है जुल्म
अब इस बार भी प्यारे मत कह देना इनको
आलसी, पियक्कड़ और कामचोर, तुम

जब चाँद पर भारत क तिरंगा दिखा, तब भी
इस घर मे ना बल्ब दिखा ना शौच दिखा
ना ही अय्याशी का कोइ ख़िलौना दिखा
ना ही आज़ाद भारत का कोई तराना दिखा

सत्तर साला होने को आये, न गरीबी हटी
न इनका भारत चमका, न किसी को ये खटका
अब कहते हो कि अच्छे दिन आने वाले हैं
खैर, आने वाले हैं अच्छे दिन, अच्छों केII


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